आर्सेनिक के जहर का कहर/ आर्सेनिक जल प्रदूषण
आर्सेनिक के जहर का कहर
आँखों को बेनूर कर रहा पानी
जन्मजात अंधापनबिहार के भोजपुर जिले के बीहिया से अजय कुमार, शाहपुर के परशुराम, बरहरा के शत्रुघ्न और पीरो के अरुण कुमार ये लोग भले ही अलग-अलग इलाकों के हैं, पर इनमें एक बात कॉमन है, वो है इनके बच्चों की आंखों की रोशनी। इनके साथ ही सोलह और अन्य परिवारों में जन्में नवजात शिशुओं की आँखों में रोशनी नहीं है। इनकी आँखों में रोशनी जन्म से ही नहीं है। बिहार के सबसे ज्यादा आर्सेनिक प्रभावित भोजपुर जिले में पिछले कुछ दिनों के अंदर 50 ऐसे बच्चों के मामले मीडिया में छाये हुए हैं जिनकी आँखों का नूर कोख में ही चला गया है। आर्सेनिक युक्त पानी से हो रहा है कैंसर
राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान रूड़की के निदेशक डॉ. आर. डी. सिंह ने ‘यूनीवार्ता’ को बताया कि पश्चिम बंगाल के कई गांवों में पीने के पानी में प्रति लीटर 3.20 मि.ग्रा. आर्सेनिक पाया गया है, जो सरकार द्वारा निर्धारित मानक से 64 गुणा अधिक है। उन्होंने बताया कि आर्सेनिक एक ऐसा विषैला तत्व है, जिसका अधिक मात्रा में सेवन किया जाए तो यह कैंसर उत्पन्न कर देता है।
तालाब पहुंचा रहे हैं भूजल तक ज़हर
आर्सेनिक का प्रदूषण तालाबों से भूजल तक पहुंच रहा है.एक नए शोध का कहना है कि बांग्लादेश के तालाब लाखों लोगों तक आर्सेनिक का ज़हर पहुंचाने के ज़िम्मेदार हैं.शोध का कहना है कि तालाबों में मौजूद आर्सेनिक ज़हर भूमिगत जल को भी प्रदूषित कर रहा है.मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्युट ऑफ टेक्नोलोजी के शोधकर्ताओं का कहना है कि बांग्लादेश के तालाबों में ऐसा कचरा फेंका जा रहा है जिसमें जैविक कार्बन की बहुतायत है और उससे भूमिगत जल भी प्रदूषित हो रहा है.
भारत के कुछ राज्यों के भूजल में उच्च आर्सेनिक की मौजूदगी
अटैचमेंट में देखें कि किस राज्य के किस ब्लॉक में यह प्रदूषण कहां तक फैला है।
उत्तर प्रदेश, असम और छत्तीसगढ़ राज्यों के मामले में आर्सेनिक प्रदूषण की पहचान केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड और राज्य भूमि जल विभागों के निष्कर्ष के आधार पर की गई है ।
स्रोत: केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड और आर्सेनिक कार्य दल (मार्च 2008)
हम पी रहे है मीठा जहर
गंगा के मैदानी इलाकों में बसा गंगाजल को अमृत मानने बाला समाज जल में व्याप्त इन हानिकारक तत्वों को लेकर बेहद हताश और चिंतित है। गंगा बेसिन के भूगर्भ में 60 से 200 मीटर तक आर्सेनिक की मात्रा थोडी कम है और 220 मीटर के बाद आर्सेनिक की मात्रा सबसे कम पायी जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार गंगा के किनारे बसे पटना के हल्दीछपरा गांव में आर्सेनिक की मात्रा 1.8 एमजी/एल है। वैशाली के बिदुपूर में विशेषज्ञों ने पानी की जांच की तो नदी से पांच किमी के दायरे के गांवों में पेयजल में आर्सेनिक की मात्रा देखकर वे दंग रह गये। हैंडपंप से प्राप्त जल में आर्सेनिक की मात्रा 7.5 एमजी/एल थी ।
तटवर्तीय मैदानी इलाकों में बसे लोगों के लिए गंगा जीवनरेखा रही है। गंगा ने इलाकों की मिट्टी को सींचकर उपजाऊ बनाया। इन इलाकों में कृषक बस्तियां बसीं। धान की खेती आरंभ हुई। गंगा घाटी और छोटानागपुर पठार के पूर्वी किनारे पर धान उत्पादक गांव बसे। बिहार के 85 प्रतिशत हिस्सों को गंगा दो (1.उत्तरी एवं 2. दक्षिणी) हिस्सों में बांटती है। बिहार के चौसा,(बक्सर) में प्रवेश करने वाली गंगा 12 जिलों के 52 प्रखंडों के गांवो से होकर चार सौ किमी की दूरी तय करती है। गंगा के दोनों किनारों पर बसे गांवों के लोग पेयजल एवं कृषि कार्यों में भूमिगत जल का उपयोग करते है।
गंगा बेसिन में 60 मीटर गहराई तक जल आर्सेनिक से पूरी तरह प्रदूषित हो चुका है। गांव के लोग इसी जल को खेती के काम में भी लाते है जिससे उनके शरीर में भोजन के द्वारा आर्सेनिक की मात्रा शरीर में प्रवेश कर जाती है।

