साक्षात्कार : जल योद्धाओं से रू-ब-रू
नाराज हैं कंपनियां : मॉड बार्लो
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जनसत्ता 29 अगस्त 2010
पानी के हक के लिए चले अभियान में सर्वाधिक चर्चित नाम है। आंदोलनकारी और लेखिका मॉड बार्लो का। कनाडा के सब से बड़े नागरिक संगठन काउंसिल ऑफ कैनेडियंस की अध्यक्ष हैं वे। यह संगठन अहिंसा और सिविल नाफरमानी में विश्वास करता है। दस विश्वविद्यालयों ने उन्हें सामाजिक सक्रियता के लिए मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया है। मुक्त व्यापार विरोधी होने के कारण कैथोलिक बिशप्स कांफ्रेंस से निकाले गए टोनी क्लार्क के साथ ‘वैकल्पिक नोबेल’ कहे जाने वाला ‘राइट लाइवलीहुड’ पुरस्कार भी उन्हें दिया गया है। चाहे बोलीविया के कोचाबांबा शहर की पानी व्यवस्था के खिलाफ चला आंदोलन हो या केरल के प्लाचीमाड़ा के ग्रामीणों का एक शीवनवासी ही शेर को बचायेंगे -सुन्दरलाल बहुगुणा
(पर्यावणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा से चिन्मय मिश्र की बातचीत)
चिन्मय - अब तो आपको भी टिहरी बांध ने विस्थापित कर दिया है। ऐसे में बांधों को लेकर आपका क्या नजरिया है?
नर्मदा क्रिकेट ग्राउण्ड बनती जा रही है
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आत्मदर्पण ब्लॉग
मेधा पाटकरनर्मदा बचाओ आंदोलन ने विगत, दो दशकों में विकास को नये सिरे से परिभाषित करने का एक मार्ग प्रशस्त किया है। उसने इस बात को प्रतिपादित किया कि विकास केवल विकास शब्द के साथ ही नहीं देखा जाना चाहिये बल्कि विकास को विनाश के साथ भी जोड़कर देखना होगा। वतर्मान विकास को लेकर कुछेक सवालों को लेकर नर्मदा आंदोलन की तेज-तर्रार नेत्री सुश्री मेधा पाटकर से बातचीत की।मेधाजी, वर्तमान विकास को आप किस तरह से देखती हैं?
2.5 एकड़ जमीन से दस-बारह लाख रु. की सालाना आमदनी!
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bhartiyapaksha.comप्रश्न : रमेशजी आज आप हर दृष्टि से एक सफल किसान हैं। हम आपके शुरुआती दिनों के बारे में जानना चाहेंगे।
रमेश डागर : बात सन् 1970 की है, घर की परिस्थितियों के कारण मुझे मैट्रिक स्तर पर ही पढ़ाई छोड़कर खेती में लगना पड़ा। तब मेरे पास केवल 16 एकड़ जमीन थी। शुरू में मैं भी वैसे ही खेती करता था जैसे बाकी लोग किया करते थे। मैंने पहले-पहले बाजरे की फसल लगाई थी, फसल अच्छी हुई, लाभ भी हुआ। फिर गेहूं की फसल लगाई, जिसमें खर-पतवार इतना
धरती का अमृत है पानी
सी.वी. रमननोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक स्व.सी.वी. रमन से किसी ने एक बार भारतीय संस्कृति के वैज्ञानिक पहलुओं पर चर्चा के दौरान पूछा- “क्या सचमुच ही अमृत जैसी कोई पेय वस्तु रही है, जिसके लिए देव-दानव संग्राम की स्थिति बन गई थी।”कुछ गंभीर होकर सोचने के उपरान्त वे बोले- “मनुष्य समाज व्यर्थ ही युगों से उस काल्पनिक दीर्घायुकारी दैवी-अमृत की खोज में रहा है, जिसकी एक घूंट वह समझता है कि उसे अमर बना देगी। जीवन का वास्तविक दाता सदा हमारे निकट रहा है और यह है सबसे सामान्य तरल, सादा पानी। प्रलयोपरान्त समुद्र के खारे पानी का शोधन-मंथन कर मीठे पानी के पानी की खोज ही संभवतः अमृत की खोज की कहानी भी रही हो। प्रलय में निश्चय ही सारा पानी
स्वस्थ जीवन के लिये स्वच्छ पानी का “अर्घ्य”
रोहिणी नीलेकणी वर्तमान समय की सबसे बड़ी समस्या है “जल प्रदूषण”, जो करोड़ों लोगों को अपनी चपेट में ले रही है, आज की सबसे बड़ी जरूरत है कि हम पानी के अपने स्थानीय स्रोतों को पुनर्जीवित करें और उन्हें संरक्षित करें ताकि एक तरफ़ तो सूखे से बचाव हो सके, वहीं दूसरी तरफ़ साफ़ पानी की उपलब्धता हो सके। साफ पानी को हमें अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण घटक मानकर भारत में पर्यावरण स्वच्छता के तरीके भी हासिल किये जा सकें। - रोहिणी निलेकणीरोहिणी निलेकणी, “अर्घ्यम” की अध्यक्षा और संस्थापक हैं, “अर्घ्यम” की स्थापना उन्होंने सन् 2005 में की थी।
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हर कॉलोनी में एक तलैया हो : केजी व्यास
मध्यप्रदेश में पानी रोको अभियान की आयोजना बनाने वाली टीम के एक सदस्य श्री केजी व्यास से भी हमने जल संरचनाओं के तकनीकी पक्ष को लेकर विस्तृत बातचीत की। श्री व्यास मूलतः भूवैज्ञानिक हैं और पानी आंदोलन के वरिष्ठ चिंतक रहे हैं। आप म.प्र. सरकार की राज्य स्तरीय जलग्रहण कार्यक्रम समिति में सदस्य भी हैं। श्री व्यास ने उन देशों की भी यात्रायें की है जहां पानी हमारे देश के मुकाबले बहुत कम बरसता है। लेकिन बेहतर जल प्रबंधन के कारण वहां के निवासियों के चेहरे पानीदार लगते हैं। इस बातचीत के कुछ अंश के माध्यम से आप भी श्री व्यास से रूबरू होईएः
अभी और जंग लड़नी है : राधा भट्ट
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chauthiduniya com
राधा भट्ट: फोटो साभार - चौथी दुनियाहिमालय को बचाना है. नदियों, पर्वतों और जंगलों को पैसों के लालची व्यापारियों की भेंट नहीं चढ़ने देना है. चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े. गांधी शांति प्रतिष्ठान की अध्यक्ष राधा भट्ट के दिन रात आजकल इसी जद्दोज़हद में कट रहे हैं. वे लड़ रही हैं. उत्तराखंड की महिलाओं के साथ आंदोलन कर रही हैं. पर्वतों, नदियों, जंगलों और घाटियों की पद यात्रा करते हुए सरकार के ख़िला़फ, व्यापारियों और बिल्डरों के ख़िला़फ विरोध के स्वर पूरी मज़बूती से दर्ज़ करा रही हैं.इस खबर के स्रोत का लिंक:
हर व्यक्ति की अपनी नर्मदा होती है- मेधा पाटकर
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निर्मला डोसी
मेधा ताईसन् सत्तावन के आंदोलन के सक्रिय भागीदार बसंत खानोलकर तथा 'स्वाधार' व अन्य समाजसेवी संस्थाओं से शिद्दत से जुड़ी इंदु ताई की बेटी मेधा साधारण स्त्री होती तो आश्चर्य होता। जिन्होंने नि:स्वार्थ समाजसेवा, देश के लिये पूर्ण समर्पण व दुर्धर्ष कर्मठता के संस्कार जन्मघुट्टी में पाये और वैसे ही स्वस्थ परिवेश में बड़ी हुईं। उनके व्यक्तित्व में जो धार है, वह यशस्वी माता-पिता से मिली। शिक्षा, संस्कार तथा परिवेश ने उसे और सान पर चढ़ाया। दिसंबर 1954 में जन्मी मेधा ने 'सामाजिक कार्य' विषय लेकर एम.ए.
