यूपी के महाराजगंज के भूजल में आर्सेनिक की स्थिति
जल पर्यावरण का जीवनदायी तत्व है. परिस्थितिकी के निर्माण में जल आधारभूत कारक है. वनस्पतियों से लेकर जीव-जंतु अपने पोषक तत्वों की प्राप्ति जल से करते हैं. मनुष्य के भौतिकवादी दृष्टिकोण, विज्ञान और तकनीक की निरंतर प्रगति, बढता औद्योगीकरण और शहरीकरण, खेतों में पैदावार बढाने के लिए रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग, कीटनाशकों का अनियंत्रित प्रयोग व जनसंख्या में हो रही वृद्धि तथा जनमानस की प्रदूषण के प्रति उदासीनता के कारण जल प्रदूषण की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है.
पंजाब के जल में आर्सेनिक का ज़हर
पंज़ाब राज्य का लगभग 80% भूजल मनुष्यों के पीने लायक नहीं बचा है और इस जल में आर्सेनिक की मात्रा अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच चुकी है… यह चौंकाने वाला खुलासा पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा किये गये एक अध्ययन में सामने आई है। पानी में आर्सेनिक की मात्रा का सुरक्षित मानक स्तर 10 ppb होना चाहिये, जबकि अध्ययन के मुताबिक पंजाब के विभिन्न जिलों से लिये पानी के नमूने में आर्सेनिक की मात्रा 3.5 से 688 ppb तक पाई गई है। यह खतरा दक्षिण-पश्चिम पंजाब पर अधिक है, जहाँ कैंसर के मरीजों की संख्या में भी बढ़ोतरी देखी गई है। जज्जल, मखना, गियाना आदि गाँव आर्सेनिक युक्त पानी से सर्वाधिक प्रभावित हैं और यहाँ इसका स्तर बेहद खतरनाक हो चुका है।
हिमाचल प्रदेश में 36,615.92 हैक्टेयर मीटर (है.मी.) भूजल
हेमंत शर्मा
शिमला: हिमाचल प्रदेश में 36,615.92 हैक्टेयर मीटर (है.मी.) भूजल की उलब्धता है। यह खुलासा केंद्रीय भूजल बोर्ड ने किया है। इसमें कांगड़ा जिला की इंदौरा-नूरपुर वेली में 9,214.96 है.मी., मंडी जिला की बल्ह वैली में 3,483.00 है.मी., सिरमौर जिला की पांवटा वैली में 6,924.14 है.मी., सोलन की नालागढ़ वैली में 6,936.12 है.मी. तथा ऊना जिला की ऊना वैली में 10,057.77 है.मी. भूमि जल उपलब्ध है। जानकारी के अनुसार प्रदेश में भूजल की विकास प्रतिशतता 31.71 प्रतिशत है जिसमें कांगड़ा में 26.42, मंडी में 22.44, सिरमौर 17.62, सोलन 14.77 तथा ऊना में 51.15 प्रतिशत है।
शिमला: हिमाचल प्रदेश में 36,615.92 हैक्टेयर मीटर (है.मी.) भूजल की उलब्धता है। यह खुलासा केंद्रीय भूजल बोर्ड ने किया है। इसमें कांगड़ा जिला की इंदौरा-नूरपुर वेली में 9,214.96 है.मी., मंडी जिला की बल्ह वैली में 3,483.00 है.मी., सिरमौर जिला की पांवटा वैली में 6,924.14 है.मी., सोलन की नालागढ़ वैली में 6,936.12 है.मी. तथा ऊना जिला की ऊना वैली में 10,057.77 है.मी. भूमि जल उपलब्ध है। जानकारी के अनुसार प्रदेश में भूजल की विकास प्रतिशतता 31.71 प्रतिशत है जिसमें कांगड़ा में 26.42, मंडी में 22.44, सिरमौर 17.62, सोलन 14.77 तथा ऊना में 51.15 प्रतिशत है।
पानी की फिक्र : दस मई से पहले धान की नर्सरी नहीं
पानी की बरबादीजैसे-जैसे औद्योगिक इकाइयों की तादाद, किसानों में नकदी फसल उगाने आदि से भूजल का दोहन तेज हुआ है। इसके चलते बहुत से इलाके बिल्कुल सूख गए हैं। वहां जमीन से पानी खींचना नामुमकिन हो गया है। अनेक क्षेत्रों में जल्दी ही ऐसी स्थिति पैदा होने की आशंका जताई जाने लगी है। भूजल संरक्षण के लिए कुछ राज्य सरकारें छिटपुट उपाय तो करती नजर आती हैं, मगर संकट के मुकाबले यह बहुत कम है। दिल्ली सरकार ने कुछ साल पहले नए नलकूप लगाने पर प्रतिबंध लगा दिया और पहले से मौजूद नलकूपों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के मकसद से शुल्क की दर बढ़ा दी। अब पंजाब सरकार ने सिंचाई के नलकूपों के मनमाने इस्तेमाल करने पर लगाम लगाने की पहल की है। उसने एक अधरुफटोप वर्षा जल संचयन : कैसे करें
गुरुत्वीय शीर्ष पुनर्भरण कुँआछत पर प्राप्त वर्षा जल का भूमि जलाशयों में पुनर्भरण निम्नलिखित संरचनाओं द्वारा किया जा सकता है। 1. बंद / बेकार पड़े कुंए द्वारा
2. बंद पड़े/चालू नलकूप (हैंड पम्प) द्वारा
3. पुनर्भरण पिट (गङ्ढा) द्वारा
4. पुनर्भरण खाई द्वारा
5. गुरुत्वीय शीर्ष पुनर्भरण कुँए द्वारा
6. पुनर्भरण शिफ्ट द्वारा
गुरुत्वीय शीर्ष पुनर्भरण कुँए द्वारा
बोरवेल / नल कूपों का इस्तेमाल पुनर्भरण संरचना के रूप में किया जा सकता है।
यह विधि वहाँ उपयोगी है जहाँ जमीन की उपलब्धता सीमित है।
जब जलाभृत गहरा हो तथा चिकनी मिट्टी से ढका हो।

