खासम-खास
जड़ें
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गांधी मार्ग, मई-जून 2013 आधुनिक दौर में, अपनी जड़ों से कट कर हमने जो विकास किया, उसके बुरे नतीजे तो चारों तरफ बिखरे पड़े हैं। स्थूल अर्थों में भी और सूक्ष्म अर्थों में भी। ढंका हुआ भूजल, खुला बहता नदियों, तालाबों का पानी और समुद्र तक बुरी तरह से गंदा हो चुका है। विशाल समुद्रों में हमारी नई सभ्यता ने इतना कचरा फेंका है कि अब अंतरिक्ष से टोह लेने वाले कैमरों ने अमेरिका के नक्शे बराबर प्लास्टिक के कचरे के एक बड़े ढेर के चित्र लिए हैं। लेकिन अभी इस स्थूल और सूक्ष्म संकेतों को यहीं छोड़ वापस उदारीकरण की तरफ लौटें।
कुछ शब्द ऐसे हैं कि वे हमारा पीछा ही नहीं छोड़ते। क्या-क्या नहीं किया हमने उन शब्दों से पीछा छुड़ाने के लिए। तब तो हम गुलाम थे। फिर भी हमने गुलामी की जंजीरों को तोड़ने की कोशिश के साथ ही अपने को दुनिया की चालू परिभाषा के हिसाब से आधुनिक बनाने का भी रास्ता पकड़ने के लिए परिश्रम शुरू कर दिया था। आजाद होने के बाद तो इस कोशिश में हमने पंख ही लगा दिए थे। हमने पंख खोले पर शायद आंखें मूंद लीं। हम उड़ चले तेजी से, पर हमने दिशा नहीं देखी।अब एक लंबी उड़ान शायद पूरी हो चली है और हमें वे सब शब्द याद आने लगे हैं, जिनसे हम पीछा छुड़ा कर उड़ चले थे। अभी हम जमीन पर उतरे भी नहीं हैं लेकिन हम तड़पने लगे हैं, अपनी जड़ों को तलाशने।
यों जड़ें तलाशना, जड़ों की याद अनायास आना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन इस प्रयास और याद से पहले हमें इससे मिलते-जुलते एक शब्द की तरफ भी कुछ ध्यान देना होगा। यह शब्द है- जड़ता। जड़ों की तरफ मुड़ने से पहले हमें अपनी जड़ता की तरफ भी देखना होगा, झांकना होगा। यह जड़ता आधुनिक है।
गंगा : मां अब मरना चाहती है
मां गंगा देख रही है हर बरस कभी कुंभ, कभी माघ मेला, कभी कार्तिक पूर्णिमा, कभी छठ पूजा और कभी गंगा दशहरा.. गंगा किनारे दुनिया के सबसे बड़े पानी का मेले लगते हैं; करोड़ों दीपदान होते हैं; कोटि-कोटि हाथ... एक नहीं, कई-कई बार गंगा के सामने जुड़ जाते हैं; हर हर गंगे ! जय जय मैया !! गाते हैं; लेकिन यही कोटि-कोटि हाथ गंगा के पुनरोद्धार के लिए एक साथ कभी नहीं जुटते। गरीब से गरीब परिवार भी अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा खर्च करके गंगा दर्शन के लिए आता है, लेकिन वह गंगा रक्षा के सिद्धांत को कभी याद नहीं करता। गंगा दर्शन को समझने और समझाने एक साथ कभी नहीं बैठता। कहने को गंगा दशहरा धरती पर मां गंगा के अवतरण की तिथि है; लेकिन मां गंगा की जो हालत हमने कर दी है, उससे हमने गंगोत्सव मनाने का हर हक खो दिया है। मां के कष्ट बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में मां का इच्छा मृत्यु माँगना आज हमारी असल जिंदगी में ही जब कोई अपवाद नहीं रहा, तो गंगा जैसी मां भी यदि अपने अवतरण दिवस पर मृत्यु की मांग कर बैठे, तो किसी को कोई ताज्जुब क्यों हो? रही बात इस पर दुख प्रकट करने की,यदि हमने जीते-जी ही मां की चिंता नहीं की, तो मृत्यु पश्चात शोक मनाने का क्या मतलब? यह न कोरी कल्पना है, नहीं न कोरी भावना; यह मां और संतानों के बीच बदलते संबंधों का यथार्थ भी है और गंगा का वर्तमान भी। तुम्हें गंगा की कसम! सीने पर हाथ रखकर कहो, क्या यह झूठ है?
गंगा पर राजनीति क्षुद्रता की जिस हद तक गिर गई है; पैसे का खेल जिस कदर बढ़ गया है; गंगा रक्षा में हम सभी जिस तरह नकारा सिद्ध हुए है; मां गंगा आर्तनाद कर रही है - “तुमने मुझे मां से महरी तो बना ही दिया है।
गंगा का आर्तनाद सुनो
गंगा पर राजनीति क्षुद्रता की जिस हद तक गिर गई है; पैसे का खेल जिस कदर बढ़ गया है; गंगा रक्षा में हम सभी जिस तरह नकारा सिद्ध हुए है; मां गंगा आर्तनाद कर रही है - “तुमने मुझे मां से महरी तो बना ही दिया है।
ऊंची छतों पर हरी-भरी दुनिया
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दैनिक भास्कर (रसरंग), 09 जून 2013 गंगा को मारने की नई साज़िश
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माटू जनसंगठन यदि समुद्र न होते तो...
समुद्रों के खारेपन की चर्चा के बगैर समुद्र का महत्व अधूरा रहेगा। यह सच है कि यदि समुद्र में पानी कम हो जाए, तो यही खारापन बढ़कर आसपास की इलाकों की ज़मीन बंजर बना दे; ऐसे इलाकों का भूजल पीने-पकाने लायक न बचे; लेकिन सच भी है कि समुद्री खारेपन का महत्व, इस नुकसान तुलना में कहीं ज्यादा फायदे की बात है। गर्म हवाएं हल्की होती हैं और ठंडी हवाएं भारी; कारण कि गर्म हवा का घनत्व कम होता है और ठंडी हवा का ज्यादा। यह बात हम सब जानते हैं। यही बात पानी के साथ है। जब समुद्र का पानी गर्म होकर ऊपर उठता है, तो उस स्थान विशेष के समुद्री जल की लवणता और आसपास के इलाके की लवणता में फर्क हो जाता है। इस अंतर के कारण ही समुद्र से उठे जल को गति मिलती है। नदियां न होती, तो सभ्यताएं न होती। बारिश न होती, तो मीठा पानी न होता। पोखर-झीलें न होती, तो भूजल के भंडार न होते। भूजल के भंडार न होते, तो हम बेपानी मरते। पानी के इन तमाम स्रोतों से हमारी जिंदगी का सरोकार बहुत गहरा है। यह हम सब जानते हैं; लेकिन यदि समुद्र न होते, तो क्या होता? इस प्रश्न का उत्तर तलाशें, तो हमें सहज ही पता चल जायेगा कि धरती के 70 प्रतिशत भूभाग पर फैली 97 प्रतिशत विशाल समुद्री जलराशि का हमारे लिए क्या मायने है? समुद्र के खारेपन का धरती पर फैले अनगिनत रंगों से क्या रिश्ता है? समुद्री पानी के ठंडा या गर्म होने हमें क्या फर्क पड़ता है? महासागरों में मौजूद 10 लाख से अधिक विविध जैव प्रजातियों का हमारी जिंदगी में क्या महत्व है? दरअसल,किसी न किसी बहाने इन प्रश्नों के जवाब महासागर खुद बताते हैं हर बरस। आइये, जानें !
सच यह है कि यदि समुद्र में इतनी विशाल जलराशि न होती, तो वैश्विक तापमान में वृद्धि की वर्तमान चुनौती अब तक हमारा गला सुखा चुकी होती। यदि महासागरों में जैव विविधता का विशाल भंडार न होता, तो पृथ्वी पर जीवन ही न होता। यदि समुद्र का पानी खारा न होता, तो गर्म प्रदेश और गर्म हो जाते और ठंडे प्रदेश और ज्यादा ठंडे।
सच यह है कि यदि समुद्र में इतनी विशाल जलराशि न होती, तो वैश्विक तापमान में वृद्धि की वर्तमान चुनौती अब तक हमारा गला सुखा चुकी होती। यदि महासागरों में जैव विविधता का विशाल भंडार न होता, तो पृथ्वी पर जीवन ही न होता। यदि समुद्र का पानी खारा न होता, तो गर्म प्रदेश और गर्म हो जाते और ठंडे प्रदेश और ज्यादा ठंडे।
बिगड़ते पर्यावरण से प्रभावित होता बिहार
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चरखा फीचर्स ‘आउटर’ पर बिक रहा बोतल बंद पानी रिपोर्टरों के लिये क्यों एक्सक्लूसिव खबर है
इंडिया टीवी इलाहाबाद के पत्रकार इमरान लईक ने आउटर पर बेरोजगार किशोरों की पलटन; रिपोटर्रों की भाषा में अवैध वेंडर द्वारा बेचे जा रहे बोतल बंद पानी पर एक शानदार एक्सक्लूसिव खबर शूट की है। फेसबुक पर इसी स्टोरी का एक मुखड़ा व उसकी तीन-चार फोटो भी नजर आयी। यह खबर हमें यह बताती है कि तमाम लड़के जो बोतलबंद पानी इस समय यात्रियों को पिला रहे हैं, वह पेप्सी का एक्वाफिना नहीं है और न ही कोक का केनली।
पानी सहेजने का अनुपम तरीका
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यू-ट्यूब आज हम पानी के परंपरागत जल स्रोत कुएँ, बावड़ियां, टांके, झालरे, जोहड़, नाड़ियां, बेरियों, तालाब और जलाशयों जैसे पानी के स्रोत को बिसरा चुके हैं। जो अभी भी हमारे लिए जल संग्रहण का काम कर रहे हैं और लोगों के लिए लाइफ लाइन साबित हो सकते हैं।
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