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जल संगठन गतिविधियां

जल संगठन गतिविधियां

चुटका के बहाने शहरों से एक संवाद

Author: 
सचिन कुमार जैन
Source: 
सर्वोदय प्रेस सर्विस, जून 2013
अधिसूचना में जहां बड़े बांधों पर पूरी तरह से रोक की बात है वहीं 25 मेगावाट से छोटे बांधों को पूरी तरह से हरी झंडी देने का प्रयास है। अस्सीगंगा में 4 जविप निर्माणाधीन हैं जो 10 मेगावाट से छोटी हैं। जिनमें एशियाई विकास बैंक द्वारा पोषित निमार्णाधीन कल्दीगाड व नाबार्ड द्वारा पोषित अस्सी गंगा चरण एक व दो जविप भी है। उत्तरकाशी में भागीरथीगंगा को मिलने वाली अस्सीगंगा की घाटी पर्यटन की दृष्टि से ना केवल सुंदर है वरन् घाटी के लोगो को स्थायी रोज़गार दिलाने में भी सक्षम है।मध्य प्रदेश के जबलपुर, भोपाल, इंदौर सहित अन्य शहरों में रहने वाले निवासियों को यह पता भी नहीं होगा कि मंडला के पांच गांवों में 10 अप्रैल से 24 मई 2013 के बीच में क्या-क्या हुआ? मंडला जिले में राज्य सरकार चौदह सौ मेगावाट बिजली पैदा करने के लिए दो परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगा रही है। नियम यह कहता है कि इस परियोजना की स्थापना के लिए ऐसा अध्ययन किया जाना चाहिए जिससे इस परियोजना के पर्यावरण यानी हवा, पानी, जमीन, पेड़-पौधों, चिड़िया, गाय, केंचुओं, कीड़े-मकोड़ों आदि पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में जानकारी मिल सके और सरकार-समाज मिल कर यह तय करें कि हमें यह संयंत्र लगाना चाहिए कि नहीं। चुटका के लोगों और संगठनों ने पूछा कि राजस्थान के रावतभाटा संयंत्र की छह किलोमीटर की परिधि में बसे गांवों में कैंसर और विकलांगता पर सरकार चुप क्यों है? क्या यह सही नहीं कि इन संयंत्रों से निकलने वाले रेडियोधर्मी कचरे का यहीं उपचार भी होगा और वह जमीन में जाकर 2.4 लाख वर्षों तक पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता रहेगा?

इंदिरा सागर बांध को 260 मीटर से ज्यादा भरना गैरकानूनी

Author: 
अग्रवाल
Source: 
जनसत्ता, 25 मई 2013
अग्रवाल ने चेतावनी दी कि बिना जमीन और पुनर्वास के वे डूब नहीं आने देंगे और सागर परियोजनाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ ऐसे कोई गैर कानूनी कदम उठाने का प्रयास किया जाएगा तो हजारों विस्थापित और उनके साथ देश भर के लोग पानी में उतरेंगे। नर्मदा बचाओ आंदोलन ने कहा है कि नर्मदा घाटी के खंडवा जिले के इंदिरा सागर बांध को 260 मीटर से अधिक भरने पर कानूनी रोक है। आंदोलन ने चेतावनी दी है कि यदि विस्थापितों के हितों की अनदेखी की गई तो जल सत्याग्रह शुरू किया जाएगा।

आंदोलन के प्रवक्ता आलोक अग्रवाल ने शुक्रवार को कहा कि गत चार जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने बिना पुनर्वास के इंदिरा सागर बांध में 260 मीटर के ऊपर पानी भरने पर मध्य प्रदेश सरकार से दो हफ्ते में जवाब मांगा था। लेकिन पांच महीने के बाद भी प्रदेश सरकार ने जवाब नहीं दिया है। इससे साफ है कि सरकार सैकड़ों घरों व खेतों को गैर कानूनी डूब की सच्चाई न्यायालय के सामने नहीं रख पा रही है। अग्रवाल ने उन खबरों को आधारहीन बताया कि इंदिरा सागर बांध में 262 मीटर तक पानी भरा जाएगा। उन्होंने कहा कि वासितविकता यह है कि बांध में 260 मीटर के ऊपर पानी भरने पर कानूनी रोक है। गत वर्ष 262 मीटर तक भरा गया पानी पूरी तरह अवैध था। प्रदेश सरकार की यह कार्रवाई हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ थी। इसके खिलाफ नर्मदा बचाओ आंदोलन ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई है। उस पर न्यायालय की ओर से जवाब मांगने पर भी सरकार ने अभी तक कोई उत्तर नहीं दिया है।

जॉब / नौकरी

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खासम-खास

जड़ें

Source: 
गांधी मार्ग, मई-जून 2013

आधुनिक दौर में, अपनी जड़ों से कट कर हमने जो विकास किया, उसके बुरे नतीजे तो चारों तरफ बिखरे पड़े हैं। स्थूल अर्थों में भी और सूक्ष्म अर्थों में भी। ढंका हुआ भूजल, खुला बहता नदियों, तालाबों का पानी और समुद्र तक बुरी तरह से गंदा हो चुका है। विशाल समुद्रों में हमारी नई सभ्यता ने इतना कचरा फेंका है कि अब अंतरिक्ष से टोह लेने वाले कैमरों ने अमेरिका के नक्शे बराबर प्लास्टिक के कचरे के एक बड़े ढेर के चित्र लिए हैं। लेकिन अभी इस स्थूल और सूक्ष्म संकेतों को यहीं छोड़ वापस उदारीकरण की तरफ लौटें।

कुछ शब्द ऐसे हैं कि वे हमारा पीछा ही नहीं छोड़ते। क्या-क्या नहीं किया हमने उन शब्दों से पीछा छुड़ाने के लिए। तब तो हम गुलाम थे। फिर भी हमने गुलामी की जंजीरों को तोड़ने की कोशिश के साथ ही अपने को दुनिया की चालू परिभाषा के हिसाब से आधुनिक बनाने का भी रास्ता पकड़ने के लिए परिश्रम शुरू कर दिया था। आजाद होने के बाद तो इस कोशिश में हमने पंख ही लगा दिए थे। हमने पंख खोले पर शायद आंखें मूंद लीं। हम उड़ चले तेजी से, पर हमने दिशा नहीं देखी।

अब एक लंबी उड़ान शायद पूरी हो चली है और हमें वे सब शब्द याद आने लगे हैं, जिनसे हम पीछा छुड़ा कर उड़ चले थे। अभी हम जमीन पर उतरे भी नहीं हैं लेकिन हम तड़पने लगे हैं, अपनी जड़ों को तलाशने।

यों जड़ें तलाशना, जड़ों की याद अनायास आना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन इस प्रयास और याद से पहले हमें इससे मिलते-जुलते एक शब्द की तरफ भी कुछ ध्यान देना होगा। यह शब्द है- जड़ता। जड़ों की तरफ मुड़ने से पहले हमें अपनी जड़ता की तरफ भी देखना होगा, झांकना होगा। यह जड़ता आधुनिक है।

गंगा : मां अब मरना चाहती है

मां गंगा देख रही है हर बरस कभी कुंभ, कभी माघ मेला, कभी कार्तिक पूर्णिमा, कभी छठ पूजा और कभी गंगा दशहरा.. गंगा किनारे दुनिया के सबसे बड़े पानी का मेले लगते हैं; करोड़ों दीपदान होते हैं; कोटि-कोटि हाथ... एक नहीं, कई-कई बार गंगा के सामने जुड़ जाते हैं; हर हर गंगे ! जय जय मैया !! गाते हैं; लेकिन यही कोटि-कोटि हाथ गंगा के पुनरोद्धार के लिए एक साथ कभी नहीं जुटते। गरीब से गरीब परिवार भी अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा खर्च करके गंगा दर्शन के लिए आता है, लेकिन वह गंगा रक्षा के सिद्धांत को कभी याद नहीं करता। गंगा दर्शन को समझने और समझाने एक साथ कभी नहीं बैठता। कहने को गंगा दशहरा धरती पर मां गंगा के अवतरण की तिथि है; लेकिन मां गंगा की जो हालत हमने कर दी है, उससे हमने गंगोत्सव मनाने का हर हक खो दिया है। मां के कष्ट बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में मां का इच्छा मृत्यु माँगना आज हमारी असल जिंदगी में ही जब कोई अपवाद नहीं रहा, तो गंगा जैसी मां भी यदि अपने अवतरण दिवस पर मृत्यु की मांग कर बैठे, तो किसी को कोई ताज्जुब क्यों हो? रही बात इस पर दुख प्रकट करने की,यदि हमने जीते-जी ही मां की चिंता नहीं की, तो मृत्यु पश्चात शोक मनाने का क्या मतलब? यह न कोरी कल्पना है, नहीं न कोरी भावना; यह मां और संतानों के बीच बदलते संबंधों का यथार्थ भी है और गंगा का वर्तमान भी। तुम्हें गंगा की कसम! सीने पर हाथ रखकर कहो, क्या यह झूठ है?

गंगा का आर्तनाद सुनो


गंगा पर राजनीति क्षुद्रता की जिस हद तक गिर गई है; पैसे का खेल जिस कदर बढ़ गया है; गंगा रक्षा में हम सभी जिस तरह नकारा सिद्ध हुए है; मां गंगा आर्तनाद कर रही है - “तुमने मुझे मां से महरी तो बना ही दिया है।

ऊंची छतों पर हरी-भरी दुनिया

Author: 
रत्ना
Source: 
दैनिक भास्कर (रसरंग), 09 जून 2013
भीषण गर्मी में कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो चुके शहरों के मकान किस तरह भट्ठी में तब्दील हो जाते हैं, ये हममें से किसी से छिपा नहीं है, लेकिन मिट्टी और वनस्पतियों से युक्त ये छतें सीधी धूप को रोककर अवरोधक का काम करती हैं। जाहिर सी बात है कि इससे बिल्डिंग का तापमान कम हो जाता है। इससे बिल्डिंग की कूलिंग कास्ट करीब बीस फीसदी तक कम हो जाती है। जहां तक भारत की बात है तो भारत में ग्रीन रूफ्स या ग्रीन बिल्डिंग्स अभी दूर की कौड़ी लगती है। कुछ बड़े शहरों में इसकी पहल तो हो रही है लेकिन ये अभी न के बराबर है, लेकिन ये बात सही है कि अगर शहर इलाके की नई बिल्डिंग्स ग्रीन बिल्डिंग्स के कांसेप्ट को लागू करें तो भारत 3,400 मेगावाट बिजली बचा सकता है। जब पूरी दुनिया में बात ग्रीन वर्ल्ड की हो रही हो, दुनिया के तेजी से खत्म होते प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की बातें हो रही हों, तो ग्रीन हाउस की परिकल्पना बहुत तेजी से हकीक़त में बदल रही है, यानी ऐसे घर जो हरे-भरे हों, जहां छतों पर हरियाली लहलहाए। जहां छतों से रंग-बिरंगे फूल मुस्कराएं। हरे-भरे लॉन में मुलायम-सी घास हो, कुछ छोटे-बड़े पेड़-पौधे हों। ऐसी छतें हमारे देश में भले ही न हो, लेकिन अमेरिका और यूरोप में हकीक़त बनती जा रही हैं। ये ऐसी छतें होतीं हैं, जिन्हें ग्रीन टॉप या ग्रीन रूफ कहा जाता है। आने वाले समय में अपने देश में भी शायद छतों पर हरी-भरी दुनिया का नया संसार दिखेगा। छतें केवल छतें नहीं होंगी, बल्कि बगीचा होंगी, खेत होंगी, फार्महाउस होंगी, जिन पर आप चाहें तो खूब सब्जी पैदा करें। इन्हीं छतों से बिजली पैदा की जाएगी। इनसे घरों का तापमान कंट्रोल किया जा सकेगा। कुछ मायनों में एसी का काम करेंगी। इन्हीं के जरिए वाटरहार्वेस्टिंग का भी काम होगा। आप चकित होंगे, एक छत से इतने काम! क्या सचमुच छतें इतने काम की हैं। हां, साहब वाकई छतें बहुत काम की हैं। भले अभी तक हमने इनका महत्व नहीं पहचाना हो, लेकिन दुनियाभर में कम होती जमीनों और पर्यावरण के प्रति जागरूकता ने छतों को वो महत्व प्रदान कर ही दिया है, जो बहुत पहले हो जाना चाहिए था।

गंगा को मारने की नई साज़िश

Author: 
विमल भाई
Source: 
माटू जनसंगठन
सैंड्रप द्वारा तैयार की गई आलोचनात्मक टिप्पणी, जिसे माटू के अलावा अन्य कई जन संगठनों ने अनुमोदित किया है, बिंदुवार समिति की रिपोर्ट की बदनीयत, चालाकी और गैरजानकारी का खुलासा करती है। जो जलविद्युत परियोजनाएं भागीरथीगंगा पर रोक दिए गए हैं उन्हें भी निर्माणाधीन की श्रेणी में दिखाया गया है। ऐसे कई उदाहरण इस रिपोर्ट में मिलेंगे जो बताते हैं की समिति ने बांध समर्थन की भूमिका ली है। बांधों की स्थिति बताने वाली सारिणी भी गलत आंकड़ों से भरी है। नदी की लम्बाई का अनुपात भी गलत लगाया गया है। समिति 81 प्रतिशत भागीरथी और 69 प्रतिशत अलकनन्दा को बांधों से प्रभावित कहती है जो कि पूरी तरह से गलत है। नापे सौ गज और काटे इंच भी नहीं। प्रधानमंत्री जी बार-बार गंगा के लिए प्रतिबद्धता जताते हैं उनकी पार्टी गंगा रक्षण का दम भरते हुए वोट भी मांगती है। किंतु ज़मीनी स्तर यह नहीं दिखाई देता है। जिसका उदाहरण है हाल ही में गंगाजी पर आई अंतरमंत्रालयी समिति की रिर्पोट। सरकार ने 17 अप्रैल, 2012 को स्वामी सानंद जी के उपवास के समय राष्ट्रीय गंगा नदी प्राधिकरण की बैठक बुलाई थी। तब सानंद जी को सरकार ने एम्स में रखा हुआ था। बैठक में वे नहीं गए उनकी ओर से कुछ संत प्रतिनिधि गए थे। प्रधानमंत्री ने उन्हें अलग से मिलने का वादा किया। बैठक में डब्ल्यू. आई. आई. और आई. आई. टी. आर. की रिपोर्ट के बारे में उठ रही तमाम शंकाओं पर विराम लगाते हुए इन रिर्पोटों को सही ठहराया। इन संत प्रतिनिधियों ने इस पर कुछ कहा हो ऐसी कोई खबर बाहर नहीं आई। बैठक शांति से निबट गई। 15 जून 2012 को सरकार ने चुपचाप से गंगा के लिए चिल्लाने वालों के मुंह में अंतरमंत्रालयी समिति का लड्डू रखा दिया गया। 15 सदस्यों में बिना किसी चयन प्रक्रिया के तीन गैर सरकारी सदस्यों को भी समिति में रखा गया। रिपोर्ट के बीच बांधों के कामों पर भी कोई रोक नहीं लगाई गई थी।

यदि समुद्र न होते तो...

समुद्रों के खारेपन की चर्चा के बगैर समुद्र का महत्व अधूरा रहेगा। यह सच है कि यदि समुद्र में पानी कम हो जाए, तो यही खारापन बढ़कर आसपास की इलाकों की ज़मीन बंजर बना दे; ऐसे इलाकों का भूजल पीने-पकाने लायक न बचे; लेकिन सच भी है कि समुद्री खारेपन का महत्व, इस नुकसान तुलना में कहीं ज्यादा फायदे की बात है। गर्म हवाएं हल्की होती हैं और ठंडी हवाएं भारी; कारण कि गर्म हवा का घनत्व कम होता है और ठंडी हवा का ज्यादा। यह बात हम सब जानते हैं। यही बात पानी के साथ है। जब समुद्र का पानी गर्म होकर ऊपर उठता है, तो उस स्थान विशेष के समुद्री जल की लवणता और आसपास के इलाके की लवणता में फर्क हो जाता है। इस अंतर के कारण ही समुद्र से उठे जल को गति मिलती है। नदियां न होती, तो सभ्यताएं न होती। बारिश न होती, तो मीठा पानी न होता। पोखर-झीलें न होती, तो भूजल के भंडार न होते। भूजल के भंडार न होते, तो हम बेपानी मरते। पानी के इन तमाम स्रोतों से हमारी जिंदगी का सरोकार बहुत गहरा है। यह हम सब जानते हैं; लेकिन यदि समुद्र न होते, तो क्या होता? इस प्रश्न का उत्तर तलाशें, तो हमें सहज ही पता चल जायेगा कि धरती के 70 प्रतिशत भूभाग पर फैली 97 प्रतिशत विशाल समुद्री जलराशि का हमारे लिए क्या मायने है? समुद्र के खारेपन का धरती पर फैले अनगिनत रंगों से क्या रिश्ता है? समुद्री पानी के ठंडा या गर्म होने हमें क्या फर्क पड़ता है? महासागरों में मौजूद 10 लाख से अधिक विविध जैव प्रजातियों का हमारी जिंदगी में क्या महत्व है? दरअसल,किसी न किसी बहाने इन प्रश्नों के जवाब महासागर खुद बताते हैं हर बरस। आइये, जानें !

सच यह है कि यदि समुद्र में इतनी विशाल जलराशि न होती, तो वैश्विक तापमान में वृद्धि की वर्तमान चुनौती अब तक हमारा गला सुखा चुकी होती। यदि महासागरों में जैव विविधता का विशाल भंडार न होता, तो पृथ्वी पर जीवन ही न होता। यदि समुद्र का पानी खारा न होता, तो गर्म प्रदेश और गर्म हो जाते और ठंडे प्रदेश और ज्यादा ठंडे।

बिगड़ते पर्यावरण से प्रभावित होता बिहार

Author: 
संतोश सारंग
Source: 
चरखा फीचर्स
दरभंगा नगर निगम ने शहरवासियों को मकान में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने पर होल्डिंग टैक्स में 5 फीसदी की छुट देने की घोषणा की है। ये कुछ सरकारी प्रयास हैं पर्यावरण के बिगड़ते मिज़ाज़ को काबू में करने और धरती को बचाने की। परंतु, यह प्रयास उस वक्त तक सफल नहीं होगा जबतक आमजन इसके प्रति जागरूक नहीं होते हैं। जरूरत है कि हम भी इको फ्रेंडली बनें। केवल कांफ्रेंस हॉल में ही इस पर विचारने से सफलता पाने की उम्मीद बेमानी होगा, बल्कि खेत-खलिहानों में भी धरती बचाने के लिए चौपाल लगानी होगी।बिहार में शीशम के पेड़ अब बहुत कम दिखाई देते हैं। मृत जानवरों को खाकर वातावरण को शुद्ध करनेवाले गिद्ध भी आकाश में मंडराते नहीं दिखते। वैशाली के बरैला झील, दरभंगा के कुशेश्वरस्थान झील व बेगूसराय के कांवर झील में प्रवासी प्रक्षियों का आना भी कम हो गया है। कठखोदी, बगेरी, लुक्खी की प्रजाति भी विलुप्त होने के कगार पर है। कोयल की कूक व घरों के मुंडेर पर कौओं की कर्कश आवाज भी मद्धिम पड़ गयी है। फसल में पटवन के समय जमीन से निकलने वाला घुरघुरा और उसे अपना निवाला बनाने वाला बगुला भी नजर से ओझल होता जा रहा है। भेंगरिया, तेतारी जैसे उपयोगी घास खोजने से नहीं मिलते हैं। पेड़ों पर पहले जैसे घोंसले नहीं देख बच्चे उदास हो जाते हैं। यह भयावह तस्वीर है, उस बिहार प्रांत की जिसकी लाइफ लाइन है खेती व पशुपालन। कहने का अर्थ है कि पारिस्थितिकी तंत्र व फसल चक्र को नियंत्रित व संरक्षित करने वाले ये सारे कारक नष्ट क्यों हो रहे हैं? इसपर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

‘आउटर’ पर बिक रहा बोतल बंद पानी रिपोर्टरों के लिये क्यों एक्सक्लूसिव खबर है

Author: 
राजीव चन्देल
इंडिया टीवी इलाहाबाद के पत्रकार इमरान लईक ने आउटर पर बेरोजगार किशोरों की पलटन; रिपोटर्रों की भाषा में अवैध वेंडर द्वारा बेचे जा रहे बोतल बंद पानी पर एक शानदार एक्सक्लूसिव खबर शूट की है। फेसबुक पर इसी स्टोरी का एक मुखड़ा व उसकी तीन-चार फोटो भी नजर आयी। यह खबर हमें यह बताती है कि तमाम लड़के जो बोतलबंद पानी इस समय यात्रियों को पिला रहे हैं, वह पेप्सी का एक्वाफिना नहीं है और न ही कोक का केनली।

पानी सहेजने का अनुपम तरीका

Source: 
यू-ट्यूब

आज हम पानी के परंपरागत जल स्रोत कुएँ, बावड़ियां, टांके, झालरे, जोहड़, नाड़ियां, बेरियों, तालाब और जलाशयों जैसे पानी के स्रोत को बिसरा चुके हैं। जो अभी भी हमारे लिए जल संग्रहण का काम कर रहे हैं और लोगों के लिए लाइफ लाइन साबित हो सकते हैं।
इस खबर के स्रोत का लिंक: 

https://www.youtube.com