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जल संगठन गतिविधियां

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21 मई को बनारस से होगा गंगा मुक्ति संग्राम का शंखनाद

उल्लेखनीय है कि गंगामुक्ति का पहला संग्राम 1912 में तब शुरू हुआ था, जब हरिद्वार में गंगा पर भीमगौड़ा बांध का निर्माण शुरू हुआ। यह गंगामुक्ति संघर्ष का शताब्दी वर्ष है। तमाम खिलाफ वैज्ञानिक अध्ययन व कैग की रिपोर्ट के बावजूद गंगा का गला घोटने की नित नये दुष्प्रयासों को अंजाम देने का राजहठ बढ़ता ही जा रहा है। मलमूत्र व औद्योगिक जहर से मुक्ति के प्रयास भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहे हैं।

आपको याद होगा कि प्रधानमंत्री के प्रतिनिधि मंत्री श्री प्रकाश जायसवाल और वी.नारायण सामी के आश्वासन पर गंगा तपस्वी स्वामी सानंद ने इसी दिल्ली में जल ग्रहण किया था। किंतु 17 अप्रैल को गंगा सेवा अभियानम् के एजेंडे पर आहूत राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की बैठक स्वामी सानंद की अनुपस्थिति के कारण निर्णायक नहीं हो सकी। इस बैठक में प्रधानमंत्री ने स्वामी सानंद से वार्ता के बाद ही किसी निर्णय की बात कही थी।

जॉब / नौकरी

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खासम-खास

‘जोड़ने’ में न टूटें लक्ष्मण रेखाएं

Source: 
गांधी मार्ग, मई - जून 2012

हिमालय का नक्शा ऊपर से देखें तो गंगा और यमुना का उद्गम बिल्कुल पास-पास दिखाई देगा लेकिन यह पर्वत का भूगोल ही है कि दोनों नदियों को प्रकृति ने अलग-अलग घाटियों में बहाया और फिर बहुत धीरज के साथ पर्वत को काट-काटकर प्रयाग तक पहुंच कर इनको मिलाया। न्याय देने वाला पक्ष-विपक्ष की लंबी-लंबी दलीलें सुनता है और तब वह नीर, क्षीर, विवेक के अनुसार फैसला सुनाता है। दूध का दूध और पानी का पानी। लेकिन नदी जोड़ो प्रसंग में अदालत ने दोनों बार दूध भुला दिया और पानी को पानी से जोड़ने का आदेश दे दिया है।

लगता है लक्ष्मण रेखाएं तोड़ने का यह स्वर्ण-युग आ गया है। जिसे देखो वह अपनी मर्यादाएं तोड़कर न जाने क्या-क्या जोड़ना चाहता है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने नदी जोड़ने के लिए सरकार को आदेश दिया है। एक समिति बनाने को कहा है और उसकी संस्तुतियां भी एक निश्चित अवधि में सरकार के दरवाजे पर डालने के लिए कहा है और शायद यह भी कि सरकार संस्तुतियां पाते ही तुरंत सब काम छोड़कर देश की नदियां जोड़ने में लग जाए! यह दूसरी बार हुआ है। इससे पहले एनडीए के समय में बड़ी अदालत ने अटलजी की सरकार को कुछ ऐसा ही आदेश दिया था, तब विपक्ष में बैठी सोनिया जी और पूरी कांग्रेस उनके साथ थी। एनडीए के भीतरी ढांचे में आज की तरह किसी भी घटक ने इसका कोई विरोध नहीं किया था। सबसे ऊपर बैठे राष्ट्रपति भी इस योजना को कमाल का मानते थे।

एकजुट न हुए तो गंगा अर्थी उठाने को तैयार रखें अपने कंधे

निर्णायक दौर में गंगा तपस्या


बंद फाइल में जा चुका गंगाएक्सप्रेस-वे का जिन्न अखिलेश यादव की सरकार की पहल पर एक बार फिर से गंगा के सीने पर मूंग दलने के लिए बाहर आने की तैयारी कर चुका है। उत्तराखंड की सरकार तो और भी खराब भूमिका में उतर आई है। उसने राष्ट्रीय नदी का गला घोंट डालने वालों के पक्ष में ही आंदोलन प्रायोजित कर डाला है। वे धमकी दे रहे हैं कि यदि उत्तराखंड की एक भी जलविद्युत परियोजना रोकी गई, तो वे न मालूम क्या कर देंगे।

संकेत मिलने लगे है कि अब गंगा तपस्या निर्णायक दौर में पहुंच गई है। आगामी गंगा दशहरा की तिथि यानी 31 मई इस तपस्या की गाथा में कोई निर्णायक मोड़ ला सकती है। इसकी संभावना बढ़ गई है। पांच में से तीन गंगा तपस्वियों की हालत नाजुक है। बाबा नागनाथ, ब्रह्मचारी कृष्णप्रियानंद और गंगाप्रेमी भिक्षु जी। बाबा नागनाथ ने ड्रिप लगाने पर आत्मदाह की धमकी दे दी है। लिहाजा प्रशासन उनके पास फटकने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। कृष्णप्रियानंद और गंगा प्रेमी को प्रशासन ने अस्पताल में जबरन भर्ती करा दिया है। गंगासेवा अभियानम् के सार्वभौम प्रमुख स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने भी 7 मई को अन्न त्याग कर अपनी तपस्या के श्रीगणेश की घोषणा कर दी है। इसके बाद से उक्त तीनों गंगा तपस्वियों ने मुंह से जरिए कुछ भी लेने से इंकार कर दिया है।

गंगोत्री से गंगा सागर तक

Source: 
आईबीएन-7 , अप्रैल-मई 2012
22 अप्रैल 2012

संत, वैज्ञानिक, समाजसेवी, पर्यावरणविद, चिल्ला रहे हैं लेकिन कोई सुनता ही नहीं। महाभारत के रचयिता वेद व्यास जैसी हालत हो गई है जो धर्म पालन के संदर्भ में यह कह रहे थे कि मैं अपनी बाहें उठा-उठाकर चिल्लाता हूं लेकिन मेरी कोई सुनता ही नहीं।

सरकार ही करे पानी के साथ न्याय

Author: 
दुष्यंत शर्मा
Source: 
नेशनल दुनिया, 04 मई 2012

राजस्थान में जब स्थानीय लोगों ने अपने अथक प्रयासों से सूखी नदियों को जीवित कर सदानीरा बना दिया तो स्थानीय प्रशासन की नजर उसके पानी पर टिक गई। जब तक नदी सूखी रही तब तक तो सरकार की ओर से उसे जीवित बनाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया लेकिन जैसे ही आम लोगों ने उसे पानीदार बना दिया तो मत्स्य विभाग के करिंदे उसके टेंडर बांटने के लिए आ पहुंचे। इस मामले में सामान्य व्यक्ति भी न्याय कर सकता है कि उस नदी और उसके पानी पर किसका हक होना चाहिए जिसे लोगों ने अपना खून-पसीना बहाकर जीवित किया हो।

जल संसाधन मंत्री पवन कुमार बंसल ने हाल ही में संसद के उच्च सदन को बताया कि बीते 65 साल में देश में पानी की उपलब्धता गिरकर एक-तिहाई रह गई है। उन्होंने यह भी कहा है कि यदि सिकुड़ते जल संसाधनों का न्यायसंगत तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो लोगों की जरूरतों को पूरा किया जा सकता है। पानी की उपलब्धता में कमी का यह खुलासा निश्यच ही चौंकाने वाला तो नहीं है। पानी की कमी और इससे पाद होने वाली हिंसक स्थितियां जनता पिछले कई सालों से, खासतौर से गर्मियों में झेल रही है। 50 साल पहले देश में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 5 हजार क्यूबिक मीटर/सालाना थी जो अब घटकर 15 सौ क्यूबिक मीटर के आसपास है। पानी की उपलब्धता में इसलिए कमी आई है क्योंकि जनसंख्या बढ़ने के साथ ही पानी मांग में वृद्धि हुई है। यह बात सहज समझी जा सकती है। कमी की वजहें और भी हैं।

खरपतवार को दोस्त बनाकर बिना जुताई की खेती

Author: 
बाबा मायाराम

इस पर्यावरणीय पद्धति में मिट्टी की उर्वरता उत्तरोतर बढ़ती जाती है। जबकि रासायनिक खेती में यह क्रमशः घटती जाती है और एक स्थिति के बाद उसमें कुछ भी नहीं ऊपजता। वह बंजर हो जाती है। कुदरती खेती एक जीवन पद्धति है। इसमें मानव की भूख मिटाने के साथ समस्त जीव-जगत के पालन का विचार है। शुद्ध हवा और पानी मिलता है। धरती को गरम होने से बचाने और मौसम को नियंत्रण करने में भी मददगार है। इसे ऋषि खेती इसलिए कहा जाता है कि क्योंकि ऋषि मुनि कंद-मूल, फल और दूध को भोजन के रूप में ग्रहण करते थे।

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद शहर से भोपाल की ओर मात्र 3 किलोमीटर दूर है टाईटस फार्म। यहां पिछले 25 साल से कुदरती खेती का अनोखा प्रयोग किया जा रहा है। राजू टाईटस जो स्वयं पहले रासायनिक खेती करते थे, अब कुदरती खेती के लिए विख्यात हो गए हैं। उनके फार्म को देखने देश-विदेश के कई लोग आते हैं। होशंगाबाद जिले में हाल ही में 3 किसानों की आत्महत्याएं हुई हैं, इससे वे विचलित हैं, पर निराश नहीं। वे कुदरती खेती को विकल्प के रूप में देखते हैं। उनका कहना है कि अब रासायनिक खेती के दिन लद गए हैं। बेजा रासायनिक खाद, कीटनाशक, नींदानाशक और जुताई से मिट्ठी की उर्वरक शक्ति कम हो गई है। तवा बांध की सिंचाई से शुरुआत में समृद्धि जरूर दिखाई दी लेकिन अब वह दिवास्वप्न में बदल गई है। होशंगाबाद में इस बार जो सोयाबीन की फसल खराब हो गई। 20 किलोग्राम से लेकर 2 क्विंटल तक प्रति एकड़ की औसतन पैदावार हुई है।

ग्रीन ट्रिब्यूनल ने लौटाई हिंडन को सांस की आस

हिंडन के इस मामले में भी ट्रिब्यूनल ने 16 अप्रैल, 2012 को फिलहाल मिट्टी भराव पर रोक लगा दी है। अभी डाली जा चुकी मिट्टी..बनाई जा चुकी भरवा सड़क को हटाकर खंभों पर निर्माण का निर्णय कराना बाकी है। कहना न होगा कि लंबी लड़ाई के बाद मिले इस स्थगनादेश ने हारी बाजी पलट दी है। इससे हिंडन की निर्मलता और अविरलता की शांत पड़ चुकी लड़ाई में एक बार फिर नई जान फूंक दी है। हिंडन के दुष्प्रभावित कई गांव अपने-अपने स्तर पर यदाकदा गुहार लगाने का काम तो 90 के दशक से ही करते रहे हैं।

हिंडन की जय! - उसकी गाड़ी के बोर्ड पर कुछ कलर स्कैच हैं। एक डिब्बी में घुली हुई नील और कूची। जहां उसे अनुकूलता दिखती है, वह गाड़ी रोक यही तीन शब्द टांक देता है। नई दिल्ली स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान के नोटिस बोर्ड पर पन्ना टांकते मैने पकड़ लिया। उसका नाम विक्रांत है। विक्रांत शर्मा-एडवोकेट! सुंदर सजीला नौजवान। कम उम्र में भी अनुभव की सफेदी उसके बालों पर दिखती है। विक्रांत की इसी प्रतिबद्धता ने हिंडन की एक हारी बाजी को जीत के रास्ते पर दो कदम आगे बढ़ा दिया है। हिंडन उत्तर प्रदेश की सर्वाधिक प्रदूषित नदी में शुमार है। सहारनपुर की कालीवाला पहाड़ियों से चलकर ग्रेटर नोएडा के तिलवारा गांव के दक्षिण में यमुना से मिलने वाली इस धारा की लंबाई 606 किमी है। इस दौरान इसमें जल से ज्यादा मिलने वाले नाले और कृष्णी-काली- नागदेवी, धमोला और पांवधोई नदियों के जरिए आ रहा मल ही दिखाई पड़ता है।

प्रलय के पदचिह्न

Author: 
दीपक रस्तोगी
Source: 
नेशनल दुनिया, 29 अप्रैल- 05 मई 2012
भारत में पूर्वाशा और बांग्लादेश में दक्षिणी तालपट्टी कहा जाने वाला द्वीप समुद्र में समा चुका है, तो घोड़ामारा द्वीप का 90 फीसदी हिस्सा जलसमाधि ले चुका है। क्या यह प्रलय की आहट है? न भी हो तो भी बंगाल की खाड़ी में समुद्र का 3.3 मिमी प्रतिवर्ष की रफ्तार से बढ़ता जलस्तर वर्ष 2020 तक 14 द्वीपों का अस्तित्व मिटा चुका होगा। इन्ही द्वीपों के बढ़ते संकट को उजागर कर रहे हैं दीपक रस्तोगी।

वैज्ञानिकों की नजर में भारत का घोड़ामारा द्वीप, समंदर बढ़ने के खतरे का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह द्वीप क्षेत्रफल में सबसे बड़ा और जैव-विविधता के लिहाज से समृद्ध रहा है। पिछले कुछ वर्षों में तो यह मशहूर पर्यटन स्थल भी बन चुका था। बंगाल की खाड़ी में स्थित यह द्वीप कभी नौ वर्ग किलोमीटीर के क्षेत्र में फैला हुआ था। पिछले 25 वर्षों में इसका क्षेत्रफल घटकर 4.7 वर्ग किलोमीटर रह गया है। इस द्वीप को लेकर बड़े पैमाने पर चिंता जताई जा रही है।

ये प्रलय के पदचिह्न नहीं तो और क्या हैं? समंदर का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है और जीवन से सराबोर द्वीप शनैःशनैः जलसमाधि ले रहे हैं। भारत और बांग्लादेश जिस एक द्वीप पर अपना हक जताते हुए पिछले तीन दशकों से खुद को विवादों में उलझाए हुए थे उसका आदर्श न्याय प्रकृति ने खुद ही कर दिया है। ताजा शोध रपटों के अनुसार, भारत द्वारा पूर्वाशा और बांग्लादेश द्वारा दक्षिणी तालपट्टी नाम से अलंकृत साढ़े तीन वर्ग किलोमीटर का वह द्वीप अब समुद्र में समा चुका है। बंगाल की खाड़ी में 70 के दशक में खोज निकाले गए एक द्वीप पर दोनों ही देश अपना हक जता रहे थे।